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रविवार, 10 जनवरी 2021

औरंगाबाद (Aurangabad) या संभाजीनगर (sambhajinagar) ? जानिए इससे जुडी पुरी कहानी

औरंगाबाद या संभाजीनगर ? जानिए इससे जुडी पुरी कहानी 



एक ऐसा शहर जिसके लोगों को बिते 30 सालों से बस चुनाव के वक़्त उस शहर का नाम बदलने की मांग  राजनेताओं की तरफ से ज़ोर-शोर से की जाती है । कोई कहता है नफरत फ़ैलाने की कोशिश हो रही है और कोई कहता है हमारी भावना है । और कुछ लोगों को अब यह मुद्दा उठाकर राजनीति में रोटियां सेंकनी है । ऐसा नही के इसे लेकर कोई हलचल नही हुई, लेकिन वह अभी तक तो फायदेमंद साबित नही हुई या इन 30 सालों में उस शहर का नाम बदला नही गया ।


चलिए जानते है पुरा मामला  :


महाराष्ट्र के साथ पुरे देशभर के हिंदु शिवसेना के संस्थापक अध्यक्ष बाला सहाब ठाकरे को आस्था की नजर से देखते है । राजनीति की दुनिया में बाला सहाब ठाकरे का एक अलग ही मुकाम रहा है ।

1988 को पहली बार महाराष्ट्र के जिले औरंगाबाद के नगर निगम चुनाव में शिवसेना के 27 पार्षद चुनकर आए थे । मराठवाड़ा सांस्कृतिक मंडल के कार्यक्रम के दौरान शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने तब औरंगाबाद की जगह संभाजीनगर इस नाम का पहली बार प्रयोग कीया था । तब से लेकर आज तक औरंगाबाद का नाम संभाजीनगर करने की मांग खास तौर पर शिवसेना और उसके नेताओं द्वारा की जा रही है । एक शिवसेना विधायक के अनुसार तब से लेकर अबतक तकरीबन 45 आंदोलन इस विषय में किए गए ।

खास बात यह के जिस वक़्त शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने पहली बार जब औरंगाबाद की जगह संभाजीनगर इस नाम का पहली बार प्रयोग कीया था, तब भी शहर में नगर निगम के चुनाव होने थे ।

महाराष्ट्र के दो शहरों का नाम बदलने के लिए शिवसेना के लोग हमेशा मांग करते रहे । शिवसेना के लिए यह अस्मिता का विषय रहा है । पहला तो औरंगाबाद था और दुसरा महाराष्ट्र का और एक जिला उस्मानाबाद । इन दो शहरों का नाम बदलकर इसे संभाजीनगर और धाराशिव करने की मांग शिवसेना कार्यकर्ताओं की तरफ से वर्षों से की जा रही है ।

शिवसेना द्वारा नामांतर का प्रयास  :


औरंगाबाद नगर निगम में शिवसेना की सत्ता आने पर
19 जुन 1995 को शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे का ख्व़ाब पुरा करने के लिए औरंगाबाद नगर निगम की और से औरंगाबाद शहर का नाम बदलकर इसे संभाजीनगर करने का प्रस्ताव पारित कर इसे राज्य सरकार की और भेज दिया गया । उस वक्त महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी की संयुक्त सरकार थी । पाँच माह के अंदर ही औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजीनगर किया गया ऐसी अधिसूचना महाराष्ट्र सरकार की और से निकाली गई । तब के तात्कालिक मंत्रीमंडल ने  संभाजीनगर इस नाम को मंजूरी दे दी थी ।

महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले पर विरोध जताते हुए तभी के औरंगाबाद महानगर पालिका के पार्षद मुष्ताक अहमद ने इस फैसले को न्यायालय में चुनौती दी । अदालत का फैसला भी उस वक़्त आ चुका था लेकिन उस वक़्त तक महाराष्ट्र में से शिवसेना और बीजेपी की सरकार जा चुकी थी । उस जगह काँग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस की आघाडी सरकार स्थापित हो चुकी थी । महाराष्ट्र के इस आघाडी सरकार ने इस नामांतर के फैसले को वापस ले लिया और न्यायालय के अंदर भी यह सब याचिकाओं को रद्द कर दिया गया ।

औरंगाबाद शहर का नाम पहले खडकी हुआ करता था । उसे औरंगजेब ने बदलकर औरंगाबाद यह अपना नाम दे दिया । औरंगाबाद स्थित सोनेरी महल में छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी महाराज को 4 माह तक बंदी बनाकर रखा हुआ था ।


राजनीतिक दलों की भुमिका  :


महाराष्ट्र के अंदर शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस और काँग्रेस की संयुक्त सरकार चल रही है । मुख्यमंत्री के पद पर पिछले एक साल से बालासाहेब ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे विराजमान है । कुछ दिनों के अंदर औरंगाबाद नगर निगम के चुनाव भी होने वाले है । 

इसी को देखते हुए सभी राजनीतिक दल, खास कर बीजेपी और महाराष्ट्र नवनिर्मान सेना मैदान में उतर चुके है । इसी विषय को लेकर बीजेपी और एमएनएस के नेता शिवसेना को घेरने का प्रयास कर रहे है । एमएनएस ने तो 26 जनवरी तक नाम बदलने की धमकी भरी चेतावनी महाराष्ट्र सरकार को दे दी है । एमएनएस के नेतागण इस विषय पर आक्रमक दिखाई दे रहे है ।

शिवसेना  : 



शिवसेना तो पहले से ही नाम बदलना चाहती है, इसमें कोई शक नही । लेकिन अभी महाराष्ट्र में शिवसेना ने 'महाविकासआघाडी' नाम से काँग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ सत्ता स्थापित की हुई है । जिसमें तिनों दलों के सहमती के बिना कोई भी फैसला नही लिया जा सकता । अगर शिवसेना अपने दम पर सरकार बनाती तो यह मुमकिन था ।

काँग्रेस  :


महाराष्ट्र दौरे पर आए काँग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और ठाकरे सरकार में कैबिनेट मंत्री बालासाहेब थोरात ने इस नामांतर को काँग्रेस पार्टी का कड़ा विरोध जताया । इस मुद्दे को लेकर शिवसेना और काँग्रेस आमने-सामने आ गए है । तब से महाराष्ट्र में इस बात को लेकर सियासत तेज हो चुकी है । इस मामले को लेकर महाराष्ट्र की यह तिन दलों वाली सरकार चलेगी की नही, इसी को लेकर विविध कयासों की बाढ़ आई हुई है ।

राष्ट्रवादी कांग्रेस  : 


राष्ट्रवादी कांग्रेस की तरफ से अभी तक इस विषय पर कोई स्पष्टता नही दी गई है । राष्ट्रवादी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री अजित पवार ने कहा है के विपक्ष इस मामले को तुल देकर तिनों पार्टियों में फुट डालने के कोशिश कर रहा है । तिनों दलों के नेता बैठकर इस मामले का हल निकालने की कोशिश करेंगे ।

एआययमआयएम (AIMIM) : 



पिछले लोकसभा चुनाव में औरंगाबाद लोकसभा सीट से एआययमआयएम (असदुद्दीन ओवैसी की ) पार्टी के सांसद इम्तियाज जलिल चुनकर आए है । उनके औरंगाबाद नगर निगम के अंदर तकरीबन 24 पार्षद मौजूद है । एआययमआयएम पार्टी की और से भी नामांतर पर प्रखर विरोध जताया जाता रहा है । इम्तियाज जलिल कह रहे है के नगर निगम के चुनाओं को देखकर यह मुद्दा उपस्थित किया जा रहा है । उन्होंने काँग्रेस के फैसले का स्वागत भी कीया है ।

बीजेपी  :


भारतीय जनता पार्टी अब इस मुद्दे को लेकर शिवसेना को घेरने रही है । लेकिन जनता सवाल उपस्थित कर रही के जब महाराष्ट्र में शिवसेना-बीजेपी की सरकार थी और औरंगाबाद नगर निगम में भी सत्ता थी तब यह फैसला क्यों नहीं लिया गया । जब तो यह आसान बात थी ऐसी भावना कुछ नागरिकों में से उभर रही है ।

रामदास आठवले  :


इस मामले को लेकर केंद्र सरकार में बीजेपी के सहयोगी और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने नामांतर को लेकर अपने पार्टी का विरोध जताया है । उन्होंने कहा के औरंगाबाद का नाम औरंगाबाद ही रहना चाहिए वरना उनकी पार्टी इसके खिलाफ प्रदर्शन करेगी ।


अब देखना यह है के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे इस मुद्दे पर काँग्रेस को समझा पाते है या इसे यूं ही पिछे रखकर आगे बढ़ते है ।


(कमेन्ट कर जरूर बताए के औरंगाबाद का नाम बदलना चाहिए के नही । क्या मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को विकास के उपर ध्यान देकर आगे बढना चाहिए । आपकी राय महत्वपूर्ण है )

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